Bhagavad Gita: अध्याय 4, श्लोक 8

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे || 8||

परित्रणाय-रक्षा के लिए; साधूनाम्-भक्तों का; विनाशाय-संहार के लिए; च-और; दुष्कृताम्-दुष्टों के; धर्म-शाश्वत धर्म; संस्थापन-अर्थाय-पुनः मर्यादा स्थापित करने के लिए; सम्भवामि-प्रकट होता हूँ; युगे युग; युगे–प्रत्येक युग में।

अनुवाद

BG 4.8: भक्तों का उद्धार, दुष्टों का विनाश और धर्म की मर्यादा को पुनः स्थापित करने के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ।

भाष्य

पिछले श्लोक में यह कहने के पश्चात् कि भगवान संसार में अवतार लेते हैं अब श्रीकृष्ण भगवान के अवतार लेने के तीन कारणों की व्याख्या कर रहे हैं-(1) दुष्टों के विनाश के लिए, (2) भक्तों के उद्धार के लिए, (3) धर्म की स्थापना के लिए। किंतु यदि हम इन तीनों बिन्दुओं का गहन अध्ययन करते हैं तब भी तीनों कारणों में से कोई भी अधिक विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता। 

1) भक्तों के उद्धार के लिए: भगवान अपने भक्तों के हृदय में वास करते हैं और उनके भीतर रहकर सदैव उनकी रक्षा करते हैं। इस प्रयोजन हेतु भगवान को अवतार लेने की आवश्यकता नहीं होती। 

2) दुष्टों के विनाश हेतुः भगवान सर्वशक्तिमान हैं और केवल अपने संकल्प से उन्हें मार सकते हैं। इसलिए ऐसा करने के लिए उन्हें अवतार लेने की क्या आवश्यकता है? 

3) धर्म की स्थापना के लिए: वेदों में नित्य धर्म का वर्णन किया गया है। भगवान संतों के माध्यम से इसकी पुनः स्थापना कर सकते हैं। अतः इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए अवतार लेना आवश्यक नहीं है। 

ऐसे में फिर उपर्युक्त श्लोक में वर्णित कारणों के अभिप्राय को हम कैसे समझ सकते हैं? श्रीकृष्ण के कथनों का आशय ग्रहण करने के लिए हमें गहनता से विचार करना होगा।

इसे भगवान की भक्ति में तल्लीन होना ही आत्मा का सबसे बड़ा धर्म है इसलिए भगवान अवतार लेकर इसे शक्ति प्रदान करते हैं। जब भगवान पृथ्वी पर अवतरित होते हैं तब वह अपने दिव्य रूप, नाम, गुण, लीला, धाम और संतों के साथ प्रकट होते हैं जिससे आत्मा को भगवान की भक्ति में लीन होने का सरल आधार प्राप्त होता है। चूँकि मन को अपना ध्यान स्थिर रखने के लिए किसी रूप का आश्रय लेने की आवश्यकता पड़ती है इसलिए भगवान के निराकार रूपों की उपासना कठिन होती है। अन्य शब्दों में साकार भगवान की भक्ति को समझना, करना और उसमें तल्लीन होना रुचिकर होता है। 

इस प्रकार 5000 वर्ष पूर्व हुए श्रीकृष्ण के अवतार से अब तक करोड़ों आत्माओं ने उनकी लीलाओं की भक्ति का आधार बनाते हुए सहजता के साथ अपने मन को शुद्ध किया। इसी प्रकार से रामायण ने सदियों से जीवात्मा को भक्ति का सुखद आधार प्रदान किया है। जब भारत में दूरदर्शन पर सर्वप्रथम रामायण श्रृंखला का प्रसारण प्रत्येक रविवार को प्रात:काल में आरम्भ हुआ था तब उस टी. वी. प्रसारण को देखने के लिए पूरे देश के सभी गली मुहल्ले खाली हो जाते थे। भगवान राम की लीलाओं ने लोगों को ऐसा मंत्रमुग्ध किया कि वे भगवान की लीलाओं को देखने के लिए अपने टी. वी की स्क्रीन से चिपके रहते थे। इससे यह ज्ञात होता है कि इतिहास में भगवान राम के अवतार ने अनन्त जीवात्माओं को भक्ति का आधार प्रदान किया। रामचरितमानस में इस प्रकार से वर्णन किया गया है-

राम एक तापस तिय तारी।

नाम कोटि खल कुमति सुधारी।। 

"अपने अवतार काल में राम ने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को स्पर्श कर पत्थर के शरीर से मुक्ति प्रदान की थी।" इस प्रकार तब से 'राम' के नाम की महिमा का गान करते हुए अनेक पतित आत्माएँ पवित्र हो गयीं। इस श्लोक का गूढ ज्ञान इस प्रकार से है-

धर्म की स्थापनाः भगवान अवतार लेकर जीवात्माओं को अपना नाम, रूप, लीला, गुण, धाम और संतों का संग प्रदान कर धर्म की स्थापना करते हैं, जिससे सभी जीव भक्ति में लीन होकर अपने अन्तःकरण को पवित्र करते हैं।

 दुष्टों का संहार करनाः भगवान की दिव्य लीलाओं को सुकर बनाने के लिए कुछ जीवन मुक्त संत भी उनके साथ अवतार लेकर आते हैं और वे खलनायक का अभिनय करते हैं। उदाहरणार्थ रावण और कुंभकरण जय और विजय थे जो भगवान के दिव्य धाम से अवतार लेकर प्रकट हुए थे। उन्होंने राक्षस का अभिनय किया और भगवान राम से शत्रुता कर उनसे युद्ध किया। वे किसी के द्वारा भी मारे नहीं जा सकते थे क्योंकि वे दिव्य पुरुष थे। इसलिए भगवान ने अपनी लीला के प्रदर्शन हेतु ऐसे राक्षसों का वध किया और उन्हें मारने के पश्चात् भगवान श्रीराम ने उन्हे अपने उसी दिव्य धाम में पहुँचा दिया जहाँ से वे पहले आए थे। 

भक्तों के उद्धार के लिए: अनेक जीवात्माएँ भगवान का साक्षात्कार करने की पात्रता प्राप्त करने के लिए अपनी साधना भक्ति में अत्यंत उन्नत हो चुकी थीं। जब श्रीकृष्ण संसार में अवतरित हुए तब इन सिद्ध आत्माओं को भगवान की लीलाओं में भाग लेने का प्रथम बार सुअवसर प्राप्त हुआ। उदाहरणार्थ कुछ गोपियाँ (वृंदावन की ग्वालिनें जहाँ श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाएँ प्रकट की), जीवन मुक्त आत्माएँ थी जो श्रीकृष्ण की लीलाओं के प्रदर्शन में सहायतार्थ उनके दिव्य धाम से अवतार लेकर प्रकट हुई थीं। अन्य गोपियाँ मायाबद्ध जीवात्माएँ थीं जिन्हें भगवान से मिलने और उनकी सेवा करने का प्रथम बार अवसर प्राप्त हुआ और उन्होंने भी उनकी मधुर लीलाओं में भाग लिया। इस प्रकार जब श्रीकृष्ण संसार में अवतरित हुए तब इन जीवात्माओं को भगवान की लीलाओं में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने और अपनी भक्ति पूर्ण करने का सुअवसर मिला। यही इस श्लोक का गूढ़ अर्थ है। फिर भी यदि कोई इस श्लोक पर अधिक साहित्यिक या शाब्दिक दृष्टि से विचार करना चाहता है तब यह अनुचित नहीं होगा।

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